Saturday, September 26, 2015

.......Back to Square one.........The Discovery of India....!!!

  ……… "नैशनल लाइब्रेरी " में नेताजी पर किताब ढूंढने लगे तो ,नेहरू जी का " द डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया " हाथ लगा। …मैने सोचा यह बहुत अच्छा हुआ : पहले नेहरू जी का फिर से पढ़ लिया जाए , फिर नेताजी ……। किम्बदंती ,बहु चर्चित ,बिबादित पुरुष हैं : यह सभी महापुरुष  …। हमारी  अपनी पुस्तैनी हवेली मे स्थित "किरण कुटीर पाठागार :स्थापित १९४२" में इस किताब को पहली दफा देखा था । ………किरणबाला मेरी दादी थी.…। १९०२ मे दादाजी, लार्ड कर्ज़ोंण द्वारा ,बंगाल पार्टीशन के पहले, पुर्बी बंगाल से बिहार चले आए……और  कटिहार मे बस गए   ....और कई साल बाद  बिरासत मे मिली, यह पाठागार की किताबें :अनमोल ।....यह पहली शिक्षा थी। …… हर दोपहर को चुपके से, मैं ,एक अलमारी खोलता और एक 'डस्टी' झुरझुर किताब निकालता .....मुझे  पता होता था, किताब की घ्राण से, की ,वह कितना पुराना होगा । …… मुझे अभी भी याद  हैं  "बंकिमचन्द्र चट्टोपध्या" द्वारा लिखी गयी रचनाबली की हालत बहुत संगीन  था : राजसिंघ ,देबिचौधुरानी , आनंदमठ ,  इंदिरा, सीताराम को बार बार मे पढ़ता था , बहुत हिफाज़त से ,और शरतबाबू को तस्सली से। ……जब मार्क ट्वेन की "एडवेंचर ऑफ़ हखलेबेर्री फिन" हाथ लगा : मेरी पहचान अमेरिका की हुई  ....... एक 'वाइड विस्टा' नज़र आया  …उस खान की कोहिनूर : एलेग्जेंडर डुमा : " द  काउंट ऑफ़ मोंटे क्रिस्टो", जब रोम  रोम मे समां गए : एड्मोंड दन्तेस और मर्सेडेस की मरसै (फ्रांस) बंदरगाह  के पटभूमि पर प्यार,और बदला की कहानी ....मुझे लगा इससे अच्छा और कुछ  हो ही नहीं सकता । …… पर जब ,हिंदी मे "पंच परमेश्वर" , :प्रेमचंद ,को पढ़ा ,तो घमासान छिड्ड गया। …… एक से बढ़ कर एक किताब …य़ेअत्स, शैली, शेक्सपियर की समग्र , गुरुदेव की संचयिता ,नज़रुल , सुकांत। एक भूचाल सा उन अलमारियों मे था, जिसका एकमात्र वारिस मे था। .... इसलिए जब मे नैशनल लाइब्रेरी  मे "द  डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया" देखा तो ठिठक कर  रुक गया ……मानो यह सभी किताबे मुझे 'वेलकम बैक' कह रही हैं....!!!!!
    

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